किसने बिछायी सर शय्या (हिन्दी कविता)



चहूं ओर बिछी है सर शय्या
टंगा है उस पर सब की काया
सबके माथे लटक रहे हैं 
कोई अर्जुन अव रहा नहीं जो
तीर चला गंग जल पिला दे!
 
'किसने' है सबको भीष्म बनाया
किसने उससा कर्म किया है
नहीं कोई है जान ही पाया
न इच्छा मृत्यु का वरदान दिया है
बस सर शय्या पर सुला दिया है!
न पीड़ा का भान उसे है
न तड़पने का ज्ञान उसे है
सबके गला में फांस लगाकर
खिल-खिलाकर हंस रहा है !

यह ताण्डव वाला खेल नहीं है
‘वह’ तो यह भी लय में करता है
कह कर जलाता और जलता है
हे ताण्डव के देव !
अव तूं आंखें खोल, पद संभाल
जो रौंद रहे हैं तेरी सत्ता
हे महाकाल ! तूं उसके छाती पर लात मार
सत्ता संभाल ! सत्ता संभाल !
विनाश को टाल !
हे महाकाल ! हे महाकाल !!!

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,17-05-2020

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