युग पुरुष (हिन्दी कविता)

युग पुरुष 

गठा   शरीर  मध्यम  है  काया 
तप  के   ताप से   तपा   तपाया 
ऋषियों  सी   है  आभा   मंडल
सर्वोच्च आसन, हाथ कमंडल !

            शुद्ध सौम्य सुचिता का जीवन 
            निष्कलंक  तन, कोमल है मन 
            गुफा   में   बैठा   देखा   उसको 
            देव पुरुष का हुआ  था  दर्शन !

क्या अर्जुन या परशुराम  है
कैसे लड़ता  यह  संग्राम  है
एक तूणीर है मुख के  अंदर 
दूजा  उसके पृष्ठ  भाग पर !

             जब  जैसा  अवसर  है   आता 
             आग उगलता या जल  वर्षाता 
             शत्रु की  छाती कांपे  थर  थर 
             मित्र गले मिल नहीं है थकता !

मां बहन की लाज  रखी है
देश  सीना  तान  खड़ा  है
सबके मन अरमान नया है 
पूरा होगा, आश   जगा  है !

             हे  युग  पुरुष हे  जन नायक
             मां  का  आंचल  तार तार  है
             कोई   बीमार ,  बेरोजगार  है
             कोई  भूखा  और  लाचार  है !

  तुम ऐसा मिट्टी गाड़ा  बनना 
  जुड़ जाये  सबकी  टूटी आशा 
  सदियों की  यह प्यासी  धरती 
   धन्य कहें सब पिता ओ माता !

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 26-05-2019

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