सपनों का घर

       सपनों का घर

किसी ने सपने  बुन लिये
       और किसी ने तिनके लाये
किलकारी फिर गूंजी ऐसी
       सपनों  में  कोपल  आये।

दिन दिन बढ़ते  गये  सपने
     लगीं  सुनहरी पंखुड़ियां उगने
कोई  सिंचने  लगा उसे नित
    सपने सच  लगे अव  दिखने ।

एक एक कर दीवारें उठ गईं
       फिर छत  पर छत पड़ गये
सपने  को  सच बनते देखा
        अपने महल  खड़े  हो गये ।

ऐसा बीज है बोया उसने
         नित  प्रेम  की वर्षा होती
सुंदर सपनों का अपना घर
       जैसे मंदिर में जलती ज्योति ।

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 30-6-2020

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